और

आज आँखें थोड़ी और झुकी हैं,
अब ऊपर देख के भी कुछ मिलता नहीं है,
हम ख़ुशियों के लिए बने नहीं थे,
सिर्फ़ एक ही ख़ुशी हमारी झोली में लिखी थी,
वो ख़ुशी ग़मों की दोस्ती में है,
बाक़ी सारी ख़ुशियाँ,
सिर्फ़ देने के लिए हैं,
हमें अपनी ख़ुशियों पे कुछ ख़ास हक़ नहीं है,
आज आँखें थोड़ी और झुकी हैं,
आज कुछ ख़ास बातें थोड़ी और दबीं हैं,
आज कुछ जज़्बात थोड़े और क़ुर्बान हुए हैं,
आज अरमान कुछ और ऐसे थे,
जो कमज़ोरी और डर के साये में,
या आसान रास्तों के लिए,
एक बार और कहीं पीछे खो दिए हैं ।

 
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Ramblings… Part 1

I am in my room. On the mattress. With a stomach that behaves strangely these days. I haven’t had proper food in months now. I am a simple man. I go to work, eat there, on weekdays. On weekends, I eat at food joints. I am lazy. I want to... Continue →