बातें
दिल में कयी बातें हैं कहने को,
जैसे ही लिखता हूँ मतलब बदल जाता है,
समंदर है मुझमें,
लहरें हैं ऊँची नीची,
कश्तियाँ डूब जातीं हैं,
आँखों के किनारे पे साहिल है,
किसी के कदम पड़ गए,
तो उसे शायद समंदर की नमी महसूस हो,
पर किनारे पे पैर रखने से गहरायी का अंदाज़ा किसे होता है,
कयी किनारों पे हम भी गए,
कयीओं ने हमारे किनारों पे रेत के महल भी बनाए,
ना हम गहरायी भाँप पाए,
ना वो,
वैसी ही कयी बातें हैं,
जो ना हम कह पाए,
ना वो ।
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